सपने का लोकतंत्र-
लोकतंत्र यानी लोगतंत्र
एक मशीन
एक सिस्टम
एक इमारत
नाम लोकतंत्र
वल्द जनता
ठिकाना भारत।
मोटा-मोटी
सरसरी नजर में
तीन भाग
एक
जो दफन है
जमीं में
कहलाता नींव
दूजा जो
खड़ा है
मूक
स्थिर
अचल
कहलाता स्तंभ
तीसरा
जो झाँकता
ऊपर से
कहलाता कंगूरा।
तीसरे पर सजे हैं
परिवार कुछ चुनिंदा
कुबेर-पुत्र
नेता
अधिकारी
और जो भी हैं
भयंकर भ्रष्ट
जो चमक रहे
बन कँगूरे।
दूजे भाग में हैं
चार स्तंभ
बस कहने भर को
मूंदे आँख
चककर खड़े हैं
भार लोकतंत्र का
जो करते कार्य
जो करते न्याय
जो करते व्यवस्था
और दिखाने भर को
उक्त पर रखता नजर
कहलाता मीडिया।
पहले में दफन हैं
बहुसंख्यक
गरीब तबका
हैं जिसमें
किसान
मजदूर
और वे सब
जो कहलाते
मेहनतकश।
ये रहे हैं
उपेक्षित सदा
दोनों की नजरों से
वो चूसकर खून इनका
लहलहा रहे
बिखेर रहे
स्वर्णिम आभा।
ये दोनों जुड़े हैं
पहले की
नाभी-नाळ से।
मिलता यहीं से
ऑक्सीजनऔर
खाद-पानी।
सपना है कि
दूसरा बने नींव
बन मूक
हो जाए दफन
दे मजबूती
लोगतंत्र की
इमारत को।
सपना है कि
तीसरा बने
स्तंभ
झेल ले
कंगूरों का बोझ।
और पहला
बन जाए कंगूरा
बिखेरे चमक
दुनिया-औ-जहान में
बन सके
भव्य इमारत
भारत के लोगतंत्र की।
अभिनव सरोवा
21 मई 2019
(निजू सपना)
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