राह में
जल की
रख पत्थर
मोड़ दी धार
रोक दिया प्रवाह
गुंजाइश छोड़ी है बस
रिसाव की।
तो याद दिला दूँ
यही रिसाव
एक दिन
पड़ेगा भारी।
टूटेगा एकदिन
भरा बाँध
प्रलय निश्चित है।
उस दिन
आएगा सैलाब
ढहेगा गढ़
नफरत का
उस दिन
हम कहेंगे
'आमीन'
अभिनव सरोवा
8 जून 2019
No comments:
Post a Comment