Sunday, 30 June 2019

निदेशक के नाम शिक्षक की पाती

पिछले दिनों बोर्ड परीक्षा परिणाम न्यून या अतिन्यून रहने के कारण कुछ विषयाध्यापकों और संस्था प्रधानों को सजा के तौर पर जिला बदर करने वाले दो आदेश देखे। इन्हें देखकर कभी खुशी कभी गम वाली फीलिंग आई। इनमें से अधिकांश को बाड़मेर और जैसलमेर( शैक्षिक दृष्टि से कमजोर या पिछड़े) जिलों में स्थानांतरित किया गया। एक तरफ माननीय निदेशक महोदय का अभिनंदन करने का जी करता है तो दूसरी तरफ कुछ सवालात भी मन में खड़े होते हैं। हालांकि मैं इतना बड़ा और समर्थ नहीं हूँ कि निदेशक महोदय के इस कार्य की आलोचना करूँ पर शिक्षा से जुड़ा होने के कारण कुछ सवाल जरूर करना चाहूँगा। मेरा मन कहता है कि सजा इन अध्यापकों और संस्था प्रधानों को मिली है या बाड़मेर और जैसलमेर के उन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को मिली है जिसमें इनकी नियुक्ति की गई है? क्योंकि जिस प्रकार मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता उसी प्रकार से इन लोगों की फितरत बदलने की गुंजाइश भी बहुत कम ही रहती है। लिहाजा सवाल उठना लाजिमी है। लोगों की नजर में भारी-भरकम और खुद की नजर में कामचलाऊ वेतन पाने वाले ये लोग शिक्षा के नजरिये से पिछड़े क्षेत्र में जाकर भी नक्कारा साबित हुए तो? दूसरा सवाल उठता है कि जिन विद्यालयों से इन्हें रुखसत किया गया है उनमें नए अध्यापकों की नियुक्ति कब तक हो जाएगी? यदि न हुए या देरी से नियुक्त हुए तो उन बच्चों की शिक्षा का क्या होगा?

          निदेशक महोदय बेहद ऊर्जावान, शिक्षा के प्रति समर्पित, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रगतिशील विचारधारा और नवाचारों को प्रतिष्ठापित करने वाले व्यक्ति हैं। ये बात मैंने 2 बार की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और उनके कार्य को देखकर महसूस की है। मुझे इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं है कि वर्तमान में ऐसे ही व्यक्ति की शिक्षा विभाग को दरकार है। शिक्षा विभाग में मेरा निजी अनुभव महज छह साल और साढ़े नौ महीने का है। इस दरम्यान एक अध्यापक के रूप में पौने पाँच साल उच्च प्राथमिक विद्यालय और व्याख्याता के रूप में दो साल उच्च माध्यमिक विद्यालय में बिताए हैं, बिताए क्या जिए हैं। इस अवधि में महसूस किया है कि बहुधा परीक्षा परिणाम जारी होने के उपरांत कुछ कार्रवाई होती है। जिनके खिलाफ कार्रवाई होती है वे राजनीतिक पहुँच और जुगाड़ लगाकर खुद को बचाने की भरसक कोशिश करते हैं। लेकिन अपने कर्त्तव्य के प्रति हमेशा ही गैर-जिम्मेदार रहे हैं। हमें चाहिए कि परिणाम जारी होने का इंतजार किए बिना सत्रारम्भ से ही वरिष्ठ अधिकारियों और संस्था-प्रधानों द्वारा बेहतर अनुवीक्षण(मॉनिटरिंग) किया जाना चाहिए। मिसाल के तौर पर वार्षिक योजना और मासिक योजना बनी है या नहीं, इसका अनुसरण भी किया जा रहा है या नहीं। अध्यापक दैनंदिनी रोज भरी जा रही है या नहीं तथा शिक्षण कार्य उसी के मुताबिक हो रहा है या नहीं। गृहकार्य की नियमित जाँच हो रही है या नहीं। कक्षा-कक्ष में शिक्षण कार्य के दौरान बच्चों की सहभागिता कितनी है तथा इस सहभागिता में भी कुछ चुनिंदा बच्चे ही शामिल होते हैं या सभी को लोकतांत्रिक रूप से अवसर मुहैया करवाए जा रहे हैं या नहीं। बाजार में उपलब्ध पास-बुक्स की कितनी मदद ली जा रही है? साथ ही संदर्भ पुस्तकों का इस्तेमाल शिक्षण कार्य में हो रहा है या नहीं? पुस्तकालय महज दिखावे की वस्तु है या उसका नियमित उपयोग भी हो रहा है या नहीं?

         उच्चाधिकारियों और संस्था-प्रधानों द्वारा महज खानापूर्ति और लीपापोती की बजाय थोड़ा सख्ती से पेश आया जाए तो वो दिन दूर नहीं जब न्यून या अतिन्यून परिणाम के कारण किसी का तबादला करने की नौबत भी आए। आज भी बहुतेरे विद्यालय ऐसे हैं जहाँ किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा औचक निरीक्षण किया गया हो। मुख्य सड़क मार्ग को छोड़कर 10 से 15 किमी अंदर देहात की स्कूल आज भी किसी अधिकारी के चरण-रज की बाट जोह रही हैं। इनका बिना किसी पूर्व सूचना के औचक निरीक्षण किये जाने की महत्ती आवश्यकता है। इस औचक निरीक्षण में कार्यालय, दस्तावेज और अध्यापकों के साथ-साथ बच्चों को भी शामिल किया जाना चाहिए बशर्ते निरीक्षणकर्ता का रवैया बच्चों के साथ मैत्रीपूर्ण हो।
    
        इसके साथ ही जब कभी पूर्व नियोजित सघन निरीक्षण किया जाए तब जहाँ तक संभव हो, शिक्षा से जुड़े व्यक्ति ही निरीक्षणकर्ता के रूप में नियुक्त किये जावें। इस हेतु कॉलेज शिक्षा की मदद ली जा सकती है।

          देखने मे आता है कि कक्षा 1  से 5 तक के बच्चों के लिए प्रथम, द्वितीय और तृतीय योगात्मक आकलन के समय किसी एक अध्यापक द्वारा अपने बच्चों के लिए तैयार किए गए मूल्यांकन पत्र राज्य के अधिकांश विद्यालयों द्वारा प्रयुक्त किये जाते हैं। वो एक या दो पृष्ठ का मूल्यांकन पत्र भी तैयार नहीं कर सकते? कई दफा गुस्सा भी आता है और मन खिन्न भी हो जाता है कि क्यों हम इतने कामचोर, आलसी और लापरवाह हो जाते हैं। चूँकि हम जानते हैं कि हर बालक की अपनी विशेषताएँ, परिस्थितियाँ और सीखने की क्षमताएँ होती हैं। बावजूद इसके हम झुन्झुनूं या सीकर के किसी अध्यापक द्वारा वहाँ के बच्चों के लिए तैयार किये गए मूल्यांकन पत्र को डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, झालावाड़, प्रतापगढ़, सिरोही या उदयपुर के ग्रामीण क्षेत्रों(शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े) में लागू करते हैं।

        ऐसा ही कुछ हाल सतत और व्यापक मूल्यांकन पाठ योजना डायरी का होता है। WHATSAPP के माध्यम से हम पाठ-योजना की माँग बड़ी बेशर्मी से करते नजर आते हैं। दूसरी बात ये लोग दैनंदिनी और पाठ-योजना डायरी को एकमेक कर देते हैं और इसी कुतर्क का आधार पर दैनंदिनी भरने से बचने की जुगत बैठाते हैं। पाठ-योजना डायरी जहाँ दो सप्ताह के लिए तैयार होती है वहीं दैनंदिनी शिक्षक का रोजनामचा है। खैर इसे छोड़ें और थोड़ी अंदर की बात करें तो देखने मे आता है कि पाठ-योजना डायरी के मुताबिक किसी विषय का चौथा पाठ चल रहा होता है जबकि भौतिक रूप से कक्षा में छठा या सातवाँ पाठ पढ़ाया जा रहा है। यहाँ  भी राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान(SIERT) द्वारा पाठ्य-पुस्तक में शामिल किए गए संकेतकों(इंडिगेटर्स) को पूर्णतया छोड़ दिया जाता है।

         हम भूल जाते हैं कि बालक आज भी हिंदी के मूर्द्धन्य कवि *निराला* की प्रसिद्ध कविता *भिक्षुक* का नायक है तो उसके अभिभावक *वो तोड़ती पत्थर* कविता के। हम जानते हैं कि सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे वो होते हैं जिनके अभिभावकों में जागरूकता का अभाव है या वे दिहाड़ी मजदूर हैं या किसानी का काम करते हैं। ऐसे में वो न तो अपने बच्चों को उचित माहौल ही दे पाते हैं और न ही विद्यालय के साथ आवश्यक संवाद ही कर पाते हैं। ऐसे में हम उनकी व्यस्तता, जागरूकता का अभाव, अपने हित और अधिकारों के प्रति सजग न होना और उनकी भलमनसी का नाजायज फायदा उठाते हैं।

         पिछले 2-3 वर्षों में शिक्षा का कार्यालयी ढाँचा काफी सुदृढ हुआ है। हर पंचायत समिति मुख्यालय पर जिला स्तर के अधिकारी की नियुक्ति होने से अनुवीक्षण( मॉनिटरिंग) प्रभावी हुआ है फिर भी इसमें और मुस्तैदी की जरूरत है। पदेन पंचायत प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी सह वेतन आहरण-वितरण अधिकारी (प्रधानाचार्य) की नियुक्ति से सेवा पुस्तिका तथा वेतन जैसे मसले तो समय पर हल हो जाते हैं पर इन सबके कारण वे अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के साथ-साथ अपनी स्कूल की मॉनिटरिंग भी नहीं कर पाते हैं। इनके साथ-साथ शाला दर्पण प्रभारी 'बेचारा' न चाहते हुए भी मारा जाता है। वो कई दफा महसूस करता है कि मेरी नियुक्ति शिक्षक के रूप में हुई है या लिपिक या कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में? वेतन बिल, परीक्षा परिणाम, उपस्थिति, छात्रवृत्ति आवेदन, बोर्ड परीक्षा आवेदन, सत्रांक भरने, प्रवेश-पत्र वितरण इत्यादि कार्यों की अधिकता के चलते जब कभी उसे कक्षा और कंप्यूटर में से किसी एक को चुनना हो तो न चाहते हुए भी उसे कंप्यूटर को चुनना पड़ता है। ऐसे में उसके विषय का बंटाधार हो जाये तो कोई क्या कहे और क्या वो खुद कहे। मैंने निजी रूप से महसूस किया है कि प्रत्येक PEEO स्कूल में प्रधानाचार्य के मातहत कार्मिकों में एक अतिरिक्त प्रधानाचार्य और एक कंप्यूटर ऑपरेटर जरूर होना चाहिए।

            हालाँकि मध्याह्न भोजन, अन्नपूर्णा दुग्ध योजना, विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं, साईकल वितरण योजना, ट्रांसपोर्ट वाउचर योजना, नेपकिन वितरण योजना, गरिमा पेटिका योजना, नामांकन मुताबिक पद सृजित होना और उसी के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति तथा बोर्ड परीक्षा परिणाम में राजकीय विद्यालयों मात्रात्मक और गुणात्मक प्रदर्शन से नामांकन, ठहराव और समुदाय में हमारे प्रति यकीन बढ़ा है। विद्यालय प्रबंधन समिति और विद्यालय विकास और प्रबंधन समिति की सक्रिय सहभागिता से विकास कार्यों को पंख लगे हैं तो दानदाताओं और भामाशाहों का सहयोग भी प्राप्त होना शुरु हुआ है।

          फिर भी हमें अपने सामूहिक प्रयासों से न केवल गुणवत्ता को कायम रखना है बल्कि इसमें उत्तरोत्तर सुधार भी करते जाना है।

    क्षमा और शुभकामनाओं सहित- एक शिक्षक।

अभिनव सरोवा
हिंदी शिक्षक
राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय- कचोटिया
ब्लॉक- पीपलखूंट
जिला- प्रतापगढ़
(राजस्थान)
पिन-312605

मो. 9314911782

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