पुरखों के पास
जमीं का
एक टुकड़ा था बस
जैसा कि सब कहते हैं
वे भी उसे
खेत ही कहते।
थोड़ा बोते ताकि
मिल सके अनाज,
दाल, कड़बी, फूस।
और
थोड़ा रखते खाली
ताकि चर सकें
ढोर-ढंगर और
ढोना न पड़े घास।
बडेरे बोते थे
घर का बीज
पैदावार कम सही
पर नीरोग होती थी।
खुद बोते थे
खुद काटते थे
खुद निकालते थे
उसीसे
महकता था
पसीना उनका
होती थी चौड़ी छाती तो
पुट्ठे भी होते थे पुष्ट।
अब कटवाते हैं मशीन से
निकलवाते हैं मशीन से
न कूटते हैं
न बरसाते हैं।
जब पसीना ही नहीं तो
महके क्या
न छाती चौड़ी है
न पुट्ठे ही पुष्ट हैं।
बस शुगर है
हर शरीर में
हमने रिश्तों में
सींचना जो छोड़ दिया।
अभिनव
15 नवम्बर 2019
अद्धभुत। मार्मिक। बहुत खूब।
ReplyDeleteडॉ. प्रशान्त