अ लो जी। अब तो अपने शाला दर्पण ग्रुप पर भी कविता रचना होने लगी हैं। जैसे 1857 की क्रांति ने लेखक-कवियों को नया विषय उपलब्ध करवाया वैसे ही शाला दर्पण ने भी एक विषय उपलब्ध करवा दिया है। तो क्या इसे भी जागरण सुधार काल का नाम दिया जाए? ये विषय सुरेंद्र जी द्वारा दिया गया इसलिए उन्हें द्विवेदी कह देते हैं। रचना के लिए अवतार जी का अभिनंदन....
कविता - अभिनव शाला दर्पण ग्रुप
______________________
फूलों की महिमा खुशबू से है,
रंगों की खासियत नजरों से है,
कोमलता न हो तो
दिल का बड़प्पन कुछ नहीं।
जब लोग शानदार हो
तो ही असर होता है,
असर एक दूसरे का
हाथ पकड़कर चलता है,
फैल जाती है बेल की तरह
जैसे कि हो कोई सामूहिक चेतना
इंसान नहीं है अपने गुणों से अलग
प्रभावी लोगों का जमघट है ये ग्रुप।
मिल जाता है सभी सवालों का जवाब
किसी को कुछ आता है, किसी को कुछ
शाला दर्पण के नाम से शुरू हुई है ये रेल
जिसमें जिज्ञासाओं की यात्रा होती है
जीवन खुद भी एक बड़ी सी खोज है
जरूरत होती है समाधान की
ये ग्रुप एक अलादीन के चिराग की तरह
उत्तर के रूप में
हर मुराद पूरी करता है।
इसके नाम में ही अभिनव है
उन दूसरे ग्रुपों से अलग है
जहां एडमिन के नाम पर
चिड़चिड़े लोग भरे हैं
जो घमंड से फूले हैं
मानो ग्रुप नहीं चलाते
मध्यकाल की कोई सल्तनत हो
और जिज्ञासु आदमी कोई बागी
जो सवाल रखने वाले का
दमन कर देना चाहते है
फर्जी अनुशासन के नाम पर।
इसके नाम में ही अभिनव है
ये बुद्धिजीवियों का ग्रुप है
ये उदारवादियों का झुंड है
ये गुणी लोगों की जमात है
ये शिक्षाविदों का जत्था है
अभिनव जी, सुरेन्द्र जी जैसे
कुछ सधे हुए लोग,
ज्ञान से भट्टी में तपे हुए लोग
कर्मठता के रंग में ढले हुए लोग
थामे है इस ग्रुप के रथ की लगाम।
जब उलझ जाता है मन
पार्थ की तरह समस्याओं से
घिर जाती है समझ,
तब झांक सकते है इस ग्रुप में
इस ग्रुप में बहुत सी खिड़कियां है
उजाला बिखरा है भीतर
एक गोता लगाने की देर है
मैं अक्सर खाली आता हूँ यहां
बहुत कुछ समेट कर ले जाता हूँ
निरन्तर होता रहता है यहाँ समुद्र मंथन
जानकारियों का अमृत
निरन्तर झरता है
स्वागत है शंकाओं
पधारो उमड़ते-घुमड़ते प्रश्नों
ये अभिनव शाला दर्पण ग्रुप है।
............
✍️ अवतार सिंह
बहुत अच्छा
ReplyDeleteअवतार जी
अभिनव जी