Saturday, 9 October 2021

कुछ यादें

तारीखों को दरकिनार कर चालू वर्ष से 2018 से बीते 20 वर्षों की बात करें तो काफी बदलाव आए हैं। ये बदलाव सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, शैक्षिक, पारिवारिक, व्यापारिक, व्यावसायिक, तकनीकी सहित हर क्षेत्र में हुए हैं। अपने निजी जीवन की बात करूँ तो ठीक 20 वर्ष पहले का अर्थात 1998 याद आता है। मुझे भली प्रकार याद है कि मई 1998 में जिस दिन मैं 11 वीं कक्षा पास करके 12 वीं में दाखिल हुआ था, उसी दिन भारत परमाणु शक्ति से संपन्न देशों की फेहरिस्त में शामिल हुआ था। वो 11 मई का दिन था जिस दिन मेरा परीक्षा परिणाम आया था। इस दिन पड़ोसी गाँव शोभा का बास में रणवीर मास्टर जी के घर चेजे पर काम कर रहा था। दोपहर की छुट्टी में अनुमति लेकर अलसीसर स्थित JK स्कूल गया और अंकतालिका लेकर सीधे चेजे पर पहुँचा था। दूसरे दिन जैसलमेर के पोकरण में किए गए परमाणु परीक्षण का समाचार मोटे-मोटे अक्षरों में छपे थे। यूँ तो सफ़ेद पृष्ठभूमि में काले अक्षर थे पर पता नहीं क्यों हर भारतीय को वो अक्षर पीले रंग के नजर आ रहे थे। पता नहीं इसके मूल में देश के प्रति प्यार था या सुबह के सूरज की करामात? मैं पहले विकल्प के साथ हूँ।  डॉ. कलाम इसी दिन से देश-दुनिया की नज़रों में आ गए थे। ये अलग बात है कि देश और दुनिया का उनके प्रति नजरिया अलग-अलग हो। आप उस दिन से करोड़ों युवाओं के रोल मॉडल बनकर उभरे और ताउम्र रहे भी। एक पत्रिका (शायद क्रिकेट सम्राट रही होगी) में उनकी फोटो छपी थी जिसे हमारे एक कमरे वाले बँगले की आतंरिक दीवार पर गेंहूँ के आटे से चिपकाई थी। 

शिक्षा का स्तर भी काफी सुधरा है। निजी स्कूल तूम्बे की बेल की तरह उग आई थी। इन बीते 20 वर्षों में बच्चों के प्राप्तांकों के प्रतिशत में दुगुना उछाल आया है। काश! इसी गति से सेंसेक्स भी उछाल मारता( वैसे मुझे इसकी समझ नहीं है)। महंगाई इस मामले में कदम-ताल मिलाकर आगे बढ़ रही है। 

1998 में उन्हीं रणवीर मास्टरजी के कुएँ पर रबी की फसल हिस्सेदारी में बोई थी। स्कूल से सीधे खेत ही पहुँचना पड़ता था। उस ज़माने में बिजली रात-दिन के साप्ताहिक क्रम में आती थी। ठिठुरन भरी रात में सिंचाई करके सुबह स्कूल जाना होता था। ये आजकल की तरह मेमोरी कार्ड और पैन ड्राइव का नहीं बल्कि वीसीआर और वीसीपी तथा ब्लैक & व्हाइट टीवी का जमाना था। वीसीआर से पहली बार फिल्म देखी। मिथुन चक्रवर्ती और धर्मेन्द्र अभिनीत गुलामी देखी। फिल्म का गीत- जिहाले-मस्ती मकुम-ब-रंजिश, बहाले-हिजरा बेचारा दिल है, आज भी जुबान पर है। ये अलग बात है कि तब इसके बोल वो नहीं थे जो आज लिखे हैं। अभिनेत्री का नाम न तब पता था न अब है, को बस की छत पर यात्रा करते देखना घनघोर आश्चर्य का कारण बन गया। स्कूल में जाकर बात भी की। आज 20 वर्षों बाद प्रतापगढ़ में युवतियों और महिलाओं को बस की छत पर यात्रा करते देखा तो गुलामी फिर से याद हो आई। ये न केवल याद आ गई बल्कि ऊपर वर्णित बदलाव भी संदेह के घेरे में खुद जाकर खड़े हो गए। अदालत हमारी होती तो इन बदलावों के कान पकड़कर पूछता कि प्रतापगढ़ से तुम्हारी क्या दुश्मनी है। ख़ैर......?

सामाजिक रूप से भी काफी बदलाव (बदलाव क्या उठापटक) देखने को मिले। मेरे गाँव में छुआछूत जैसी बीमारी मेरी आँखों के सामने मौत के मुँह में समा गई। शादी-ब्याह के मामले एक तरफ शादी की उम्र बढ़ी है तो दूसरी तरफ ये घरवालों की बजाय युवाओं की सहमति के बाद ही तय होने लगे हैं। कहीं ये रिश्ता प्रगाढ़ हुआ है तो कुछ ऐसे भी उदाहरण देखने में आये हैं जिनकी वजह से पुराने पारिवारिक रिश्ते तक खटाई में पड़ गए। कुछ मिसाल दहेज मुक्त विवाह की मिलती हैं तो कुछ युवाओं की उच्च पदों पर जाने के बाद बोलियाँ भी लगी हैं। इसी क्रम में युवतियों ने भी पद पाने के बाद पूर्व में तय रिश्तों को तोड़ा है। रातोंरात उनका "स्तर" हाई लेवल का हो जाता है। बिजली की लाइन जरूर हाई टेंशन सुनी थी पर स्तर.....?

मृत्युभोज जैसी कुरीति जहाँ कब्र में पाँव लटकाए बैठी हैं वहीं दशोठण (छुछुक) जैसी नई कुरीति रूपी नागिन धनिकों के पैर तले पूँछ दबाए पड़ी है, जो हर अमीर-गरीब को डस रही है। लिंग के आधार पर संतान में भेदभाव कम हुआ है जिससे लू में शीतलता का अनुभव होता है। 

कड़वाहट के मामले में सास-बहू का जो रिश्ता भयंकर बदनाम था, आज 'नाक' के चक्कर में "झेलने" वाली स्थिति में पहुँच गया है। 

आर्थिक रूप से लोगों की आमदनी बढ़ी है तो खर्चे भी उससे होड़ लगाए बैठे हैं। एक तरफ रोजगार बढे हैं पर जनसंख्या के मुकाबले ये कम ही हैं। तकनीकी, संचार और यातायात सेवाओं के विस्तार और आधुनिकीकरण से व्यापार की दशा और दिशा ही बदल गई है। नई आने वाली हर वस्तु ग्राहक को मानसिक रूप से बंदी बनाने के बाद ही बाजार में आती है। ये टीवी पर पहले पहुँचती हैं। टीवी के भी अपने नफे-नुकसान हैं। एक तरफ देश-दुनिया की जानकारी, शिक्षा से संबद्ध कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं तो दूसरी तरफ सास- बहू, ननद-भौजाई को 'झेलने' वाली प्रवृत्ति का विकास एकता कपूर वाले धारावाहिकों से हुआ है। आज तो एकता (निर्माता) भी बाढ़ के कुसंस्कृत पानी की भाँति रिश्तों की मौत का तरल दूत बनकर बह रहे/रही हैं। 
आज हम अपने डाक्यूमेंट्स को ऑनलाइन वॉलेट में सेव रखते हैं पर वो दिन भी याद है जब हम रोजगार पंजीयन कार्यालय में सालाना कार्ड बनवाते थे। आज की पीढ़ी इस सरकारी सेवा से महरूम है (बेचारे, हम या ये; समझ नहीं आ रहा)।

ये वो संक्रमण काल था जब लोग गाँवों को छोड़कर शहरों की तरह भागे थे। जैसे गाँव में आग लग गई है और ये पाटे उतर गया है। कुछ तो इतनी खुन्नस खाकर आये थे कि कभी गाँव में झाँककर भी नहीं देखेंगे, पर भला हो इस महंगाई और शहरी बड़प्पन का, जो टूटे शीशे में भी मुँह दिखा दिया। हर आदमी अपने से आगे वाले को रौंदकर आगे निकल जाना चाहता था, चाहे भी क्यों नहीं, पीछे वाला इसे कुचल देता तो....!

खानपान, वेशभूषा में भारी फेरबदल हुए हैं। कुछ दिल को सुकून देने वाले हैं तो कुछ झुंझलाहट बढ़ाने वाले( कुछ की तो बीपी भी बढ़ जाती होगी)।
मसलन 30 इंच की कमर वाला लौंडा 32 या 34 इंच कमर वाली पेंट सिलवाता है और खुद को उसके अंदर भी डालता है। उसके बाद की भयावह स्थिति न लिखने लायक है न कहने, सुनने लायक। 

एक तरफ पुरुषों के बदले महिलाओं की घटती संख्या भी हमारी वैज्ञानिकता पर सवाल खड़े करती है तो दूसरी तरफ पुरुष वर्चस्व वाले क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी अभिमान करने के लिए पर्याप्त कारण है। 

युवाओं में शराब के साथ-साथ अन्य नशीले पदार्थों के सेवन के मामले भी बढे हैं। इनमें पीड़ादायक ये है कि लड़कियाँ भी पीछे नहीं रहीं। सभी नहीं हैं पर कुछ हैं। कुछ जीव बालों की कटिंग ऐसे करवाते हैं जैसे एक साइड में कोई ट्रैक्टर वाला कराऊ (गोवड़ी) लगा गया हो। 

2002 या 03 में पहली बार मोबाइल देखा और घर जाकर बुआजी को बताया तो उन्होंने यकीं नहीं किया। कुछ दिनों बाद पता चला कि ऐसी एक मशीन आई तो है जिससे बात की जा सकती है पर बात करने के ही नहीं सुनने के भी पैसे लगते थे और आज.....?
आज व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा के कारण एक तरफ सेवा प्रदात्ता पर सेवा की गुणवत्ता बनाये रखने का दवाब है वहीं दूसरी तरफ ग्राहक के पास दूसरा विकल्प। कोई भी व्यापारी अपनी ग्राहक को अपने दामन से छिटकने नहीं देना चाहता वहीं ग्राहक के लिए दूसरा कार्ड लिए खड़ा है। 

रसोई के बर्तन बदल गए। मिट्टी और सिल्वर के बर्तनों की जगह स्टील ने ले ली है। यहाँ तक कि चिमटा भी स्टील का आ गया है। शुक्र है ये अब आया है 1936 से पहले आया होता तो प्रेमचंद का हमीद इसे खरीद भी नहीं पाता और दादी के हाथ जलते ही रह जाते। 

ओढ़ने-बिछाने का बिस्तर बदल गए। गुदड़े और उपराँत(हंसराज) का स्थान गद्दे, रजाई या कोरियाई कम्बल ने ले ली है। यहाँ तक कि इन बिस्तरों पर सोने-उठने का और बर्तनों में खाने और इन्हें माँजने का समय भी बदल गया है। 

नहीं बदला है तो जिहाले-मस्ती मकुम-ब-रंजिश... गाना, बस की छत, गुलामी फिल्म, प्रतापगढ़ की महिलाएँ और यहाँ के हालात.....! 

खैर, समय सदा एक-सा नहीं रहता, हमारा प्रतापगढ़ भी बदलेगा। 

अभिनव सरोवा

09 अक्टूबर 2018

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