Friday, 14 June 2019

मृत्युभोज

मृत्युभोज-

आइए, कुछ साल पहले का जिक्र करते हैं। इस 'कुछ' में सैंकड़ों भी हो सकते हैं तो हजारों भी। अपनी-अपनी सुविधानुसार सोच सकते हैं। उस समय संचार और आने-जाने के साधन न के बराबर थे। जो थोड़े-बहुत थे उन पर भी धनाढ्य वर्ग का प्रभुत्व था। बहुसंख्यक आम जनता इन सुविधाओं से महरूम थी, वंचित थी। ऐसे में किसी दूर या निकट के रिश्तेदार के देहांत की खबर पहुँचाने में समय लग जाता था। फिर आने-जाने के साधनों के अभाव में सभी रिश्तेदारों को शोक संवेदना प्रकट करने मृतक के घर जाने में 10-12 दिन लगना कोई बड़ी बात नहीं थी।
    मेरे हिसाब से ये 12 दिन वाली परिपाटी भी ऐसे ही बनी होगी। जब सब रिश्तेदार आये तब तक किसी के 10 लगे, किसी के 12 किसी के 14 या 15 दिन। और अंततः  12 दिन निश्चित हो गए होंगे और फिर ये परिपाटी बन गई। खैर इस पर ज्यादा नहीं। वापिस चलते हैं विषय के शीर्षक मृत्युभोज पर। तो हुआ ये होगा कि भौगोलिक दूरियों को पैरों से मापकर दोपहर तक मृतक के घर और शाम या देर रात तक वापिस अपने घर। अकेले, दुकेले या सामूहिक रूप से शोक प्रकट करने जाना रिश्तेदारी की निकटता और दूरी तय करती थी। घड़ी के अभाव में तारों को देखकर घर से निकलना, दोपहर तक मृतक के घर पहुंचना। ऐसे में हर कोई जान सकता है कि इतनी दूर से आया है तो भूखा तो है ही। इसलिए खाना खिलाया जाता और कालांतर में यही खाना मृत्युभोज के रूप में सामने आया। समय के साथ-साथ नाक और प्रतिष्ठा के चक्कर में ये और ज्यादा खर्चीला बनता गया।

       आज से 2 से 3 दशक पहले तक तो ये भयंकर रूप में था। पिछले 10-20 साल से जरूर कम हुआ है पर अभी भी सुधार की जरूरत है। आज भी हर गाँव में इसके आयोजन देखे जा सकते हैं। इसके दुष्परिणाम भी हैं। जिन पर बात करते हैं।

            कल्पना कीजिये कि एक आदमी के चार बेटे हैं। एक किसी सरकारी विभाग में बड़के वाला अधिकारी है। हाथ की खुजली भी अकसर मिट जाया करती है। शहर में लंबा-चौड़ा मकान है। दूसरा सरकारी विभाग में कर्मचारी है। तीसरा खेती करता है और चौथा भी करता तो खेती ही है पर खुद या पत्नी या बच्चों में से कोई एक नियमित रूप से बीमार रहता है और डॉक्टर के साथ-साथ मेडिकल स्टोर और लैब वालों के बच्चों का पेट भी पालता है। अब इनके पिता का देहांत हो गया। 12 दिन तक जमकर खर्च किया गया। 12 वें दिन दरी उठने से पहले ही पूरे खर्च को जोड़कर एक बट्टा चार किया गया। ऐसी स्थिति में पहले को कोई दिक्कत नहीं, दूसरे को कम दिक्कत, तीसरे को उससे ज्यादा और चोइथे से कम तथा चौथे के बारे में एक और कल्पना कर डालिए(एक पहले कर ही चुके)।
    ये जो चौथा है न ये अपनी बेटी की शादी कम से कम खर्च ने कर सकता था क्योंकि उसका वो अकेला बाप था।  पर जो मरा वो उसके अकेले का नहीं बल्कि चारों का सामूहिक बाप था। इसलिए खर्चा बराबर। बात खत्म। कई दफा भाई कुछ सहायता देने का प्रयत्न करता है(हालांकि ऐसा बहुत कम होता है) तो भाभी(महिलाओं से माफी सहित) याद दिला देती है कि ये आप अकेले का नहीं बल्कि सामूहिक बाप था तो खर्चा भी उसी अनुपात में।

        एक बात और- कुछ लोग बड़े आदर्शवादी होते हैं। जिस किसी के भी घर मे किसी का देहांत हुआ नहीं कि ज्ञान की पोटली लेकर पहुँच जाते हैं और बताते हैं कि मृत्युभोज गलत परंपरा है। हमें इसे छोड़ देना चाहिए। बहुत सी बातें बताते हैं। कई मिसाल भी देते हैं। अगला मानता नहीं, इनके जीमण की व्यवस्था हो जाती है। माल छककर हलक से उतारा जाता है। इसी दरम्यान उसके माँ-बापू में से कोई टपक जाता है तो अरथी बाद में उठती है, कड़ाही पहले चढ़ती है। अब कोई 'बेशर्म' उनसे पूछ ले कि आप तो ज्ञान ढोळते थे, आज क्या हुआ? तब जो जवाब मिलेगा, वो अपेक्षानुरूप ही होगा। उसमें खास बात ये छिपी होगी कि जिसने बेशर्मी का चित्र न देखा हो, उन हजरत के मुँह पर देख सकता है। ये सुविधा निश्शुल्क उपलब्ध रहती है। ऐसे महारथी भी हर गाँव मे एकाध मिल ही जाते हैं। उनका जवाब होगा कि यार, खाया है तो खिलाना भी पड़ेगा ही।

     मृत्युभोज एक गलत परंपरा है इसे जितना जल्द हो, बन्द करें और लोगों को प्रेरित करें। ऐसी परंपराओं को बंद करना साहस का काम है। हम सीमा पर नहीं जा सकते पर समाज में व्याप्त इन कुरीतियों के खिलाफ तो लड़ सकते हैं।

नोट- उक्त विचार पूर्ण रूप से मेरे निजी विचार हैं। इसके लिए न कोई शोध किया है न ही किसी प्रकार की केस स्टडी। आज दोपहर बाद बैठे-बैठे मन मे विचार आया और छाप पर आपको पेल दिया। किसी के साथ कोई संयोग बैठता है तो उसे मात्र संयोग ही समझा जाए।

अभिनव सरोवा
14 जून 2019 को बाद दोपहर उपजी एक खुराफात।

हो सकता है कि आप मेरे विचार से सहमत न हों पर विचार प्रकट करने के मेरे अधिकार की रक्षा करें।😊

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